"" शरद हवाएं ""
ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !
मेरे अंतर्मन में फिर से मत ठंडी आस जगाओ
ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !
तेरी धुंधली औस की बूंदे मन को फिर से तड़पाती हैं
बीते पल जो सदियों पहले उनको फिर से छू जाती है
बस रहने दो इन लहरों से तुम फिर से मत ठिठुरावओ
ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !
फिर से बागियों में पतझड़ है फिर से कोयल चहकी है
मतवाला मन फिर डोला है सुनके पिहुंक मोर सी है
घनी चांदनी शीतलता से मत मन को ओउर लुभाओ
ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !
घनी औस से भरी शाम में , उसका छुप छुप के आना
सरगोशी से बांह पकड़ना मन में तन में बस जाना
तेज्ज़ बहरते झोंको से मत प्रियतम की याद दिलाओ
ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !
रचना :- सन्नी शुक्ल
ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !
मेरे अंतर्मन में फिर से मत ठंडी आस जगाओ
ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !
तेरी धुंधली औस की बूंदे मन को फिर से तड़पाती हैं
बीते पल जो सदियों पहले उनको फिर से छू जाती है
बस रहने दो इन लहरों से तुम फिर से मत ठिठुरावओ
ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !
फिर से बागियों में पतझड़ है फिर से कोयल चहकी है
मतवाला मन फिर डोला है सुनके पिहुंक मोर सी है
घनी चांदनी शीतलता से मत मन को ओउर लुभाओ
ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !
घनी औस से भरी शाम में , उसका छुप छुप के आना
सरगोशी से बांह पकड़ना मन में तन में बस जाना
तेज्ज़ बहरते झोंको से मत प्रियतम की याद दिलाओ
ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !
रचना :- सन्नी शुक्ल

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