Wednesday, 28 December 2011

तेरी अंखियो से !


''प्रियतम'' कुछ तो प्रतीत होता है तेरी अंखियो से !

मंद मंद सी मुस्काती ये चंचल अंखिया, कह जाती है अक्स़र कुछ ऐसी बतिया
जो न तुमने साफ़ कहा है अपनी बतियो से !
''प्रियतम'' कुछ तो प्रतीत होता है तेरी अंखियो से !

अक्स़र मैंने ये महसूस किया है, तेरा भी कुछ मुझमे लगे जिया है
फिर क्यों आती है लाज तुझे इन् बतियो से !
''प्रियतम'' कुछ तो प्रतीत होता है तेरी अंखियो से !

अदभुत सा यह रूप तुम्हारा ,विस्मित है मन देख ये सारा
विहवल है आतुरता की इन् रतियों से !
''प्रियतम'' कुछ तो प्रतीत होता है तेरी अंखियो से !

पंखुड़ियों के पौर ज़रा तू खुलने दे , इन् अधरों को स्वर आलिंगन करने दे
फिर गूंजेगा गीत इन सभी स्मर्तियों से !
''प्रियतम'' कुछ तो प्रतीत होता है तेरी अंखियो से

''प्रियतम'' कुछ तो प्रतीत होता है तेरी अंखियो से
सभी प्यारे मित्रो को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये !!
(रचना - सन्नी शुक्ल )
 

Saturday, 10 December 2011

"" शरद हवाएं ""


"" शरद हवाएं ""

ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !
मेरे अंतर्मन में फिर से मत ठंडी आस जगाओ
ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !

तेरी धुंधली औस की बूंदे मन को फिर से तड़पाती हैं
बीते पल जो सदियों पहले उनको फिर से छू जाती है
बस रहने दो इन लहरों से तुम फिर से मत ठिठुरावओ
ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !

फिर से बागियों में पतझड़ है फिर से कोयल चहकी है
मतवाला मन फिर डोला है सुनके पिहुंक मोर सी है
घनी चांदनी शीतलता से मत मन को ओउर लुभाओ
ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !

घनी औस से भरी शाम में , उसका छुप छुप के आना
सरगोशी से बांह पकड़ना मन में तन में बस जाना
तेज्ज़ बहरते झोंको से मत प्रियतम की याद दिलाओ
ये शरद हवाओ जाओ , तुम मेरे पास न आओ !

रचना :- सन्नी शुक्ल